दुनिया के लिए मर जाता हूँ, ताकि खुद के भीतर ज़रा सा ज़िंदा रह सकूँ
दिनभर दुनिया के बाज़ार में खुद को किश्तों में बेचने के बाद, जब शाम ढलती है, तो मैं बाकी बचे-खुचे ‘मैं’ को समेटकर अपने एकांत के अंधेरे कोने में लौट आता हूँ।
अंधेरा गहराते ही जब शहर की बत्तियाँ जलती हैं, तो मेरे भीतर सदियों पुरानी एक उदासी अपनी आँखें खोलती है। पूरा दिन जिन आंसुओं को ‘मजबूती’ का मुखौटा पहनकर रोके रखा था, शाम होते ही वे रिसने लगते हैं। तब समझ आता है कि हम एक दूसरे से मिलने के लिए कितना सजते-संवरते हैं, पर खुद से मिलने के लिए सिर्फ लहूलुहान रूह और थकी हुई साँसें ही काफी हैं।
चाय की ठंडी होती प्याली में जब धुएँ को मरते देखता हूँ, तो लगता है जैसे मेरी ही कुछ ख़्वाहिशें दम तोड़ रही हैं। उस सन्नाटे में मैं अपने ही भीतर बैठे उस सहमे हुए बच्चे को छूता हूँ, जिसे सुबह काम पर निकलते वक़्त मैं घर की चौखट पर अकेला छोड़ गया था। वह मुझसे लिपटकर रो पड़ता है, और पूछता है—”सबका दिल रखते-रखते, हमारा अपना दिल कहाँ खो गया?”
शाम को खुद से मिलना, अपने ही वजूद के मलबे में उतरकर अपनी राख को टटोलने जैसा है। यह वह वक़्त है जब मैं दुनिया के लिए मर जाता हूँ, ताकि खुद के भीतर ज़रा सा ज़िंदा रह सकूँ।
और फिर धीरे-धीरे कमरे की दीवारें बोलने लगती हैं। वे उन तमाम बातों की गवाह हैं जिन्हें मैं किसी से कह नहीं पाया। अलमारी में रखी पुरानी किताबें, मेज़ पर पड़ी अधूरी डायरी, मोबाइल में अनखुले पड़े संदेश—सब मेरी तरफ़ ऐसे देखते हैं जैसे उन्हें मेरे टूटने का समय पता हो।
मैं खिड़की खोलता हूँ। बाहर सड़क पर लोग अब भी भाग रहे होते हैं। किसी को घर पहुँचने की जल्दी है, किसी को सपनों की। मैं उन्हें देखता हूँ और सोचता हूँ कि शायद हर आदमी अपने भीतर कोई न कोई युद्ध लड़ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग मुस्कुराते हुए हार रहे हैं, और कुछ रोते हुए जीतने की कोशिश कर रहे हैं।
रात थोड़ी और गहराती है। मैं अपने बीते हुए दिनों की धूल झाड़ने लगता हूँ। कुछ चेहरे याद आते हैं, जो कभी मेरी दुनिया हुआ करते थे। कुछ रिश्ते याद आते हैं, जिन्हें बचाने के लिए मैंने खुद को खो दिया। कुछ सपने याद आते हैं, जिन्हें पूरा करने की जिद में मैंने जीना ही टाल दिया।
तब एहसास होता है कि उम्र सिर्फ सालों से नहीं बढ़ती, कुछ इंतज़ार भी आदमी को बूढ़ा कर देते हैं।
मैं अपने भीतर उतरता हूँ और वहाँ एक सुनसान शहर पाता हूँ। कभी जहाँ उम्मीदों की चहल-पहल हुआ करती थी, वहाँ अब यादों के जर्जर मकान खड़े हैं। कुछ दरवाज़े अब भी खुले हैं, शायद किसी लौट आने वाले के इंतज़ार में। कुछ खिड़कियाँ हमेशा के लिए बंद हो चुकी हैं।
लेकिन इसी वीराने में कहीं एक छोटा सा दीपक भी जल रहा होता है।
वह उम्मीद का दीपक है।
वह कहता है कि जीवन सिर्फ खो देने का नाम नहीं है। जो बिखरा है, वह कभी न कभी फिर से जुड़ भी सकता है। जो टूट गया है, वह किसी नए रूप में फिर जन्म ले सकता है। और जो आदमी आज अपने आँसुओं के साथ अकेला बैठा है, वही कल किसी और की मुस्कान की वजह भी बन सकता है।
फिर मैं अपने आँसुओं को पोंछता हूँ, अपने भीतर बैठे उस बच्चे का हाथ पकड़ता हूँ और उससे कहता हूँ—”चलो, आज भी बच गए।”
वह मुस्कुरा देता है।
और उसी मुस्कुराहट में मुझे अगली सुबह का साहस मिल जाता है।
क्योंकि हर शाम खुद से मिलना, सिर्फ टूटने की प्रक्रिया नहीं है; यह अगली सुबह फिर से खड़े होने की तैयारी भी है। शायद इसी वजह से मैं हर दिन दुनिया में बिखर जाता हूँ, ताकि हर शाम अपने भीतर थोड़ा-सा और पूरा होकर लौट सकूँ।
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