हैपी फादर्स डे-वो जो मैं कभी कह नहीं पाया
पिता ने अपनी जवानी के वो सबसे बेहतरीन और सुनहरे दिन सिर्फ कमाने में गुजार दिए। एक-एक पल, एक-एक सांस उन्होंने काम के नाम कर दी—सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चों का कल बेहतर हो सके, उनका जीवन संवर सके। अपने परिवार, अपने सुकून, अपने गाँव और उस घर की चौखट से मीलों दूर रहते हुए भी उनके चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं आई। उन्होंने कभी कोई शिकायत नहीं की। शहर चाहे कितना भी पराया रहा हो, हालात चाहे कितने भी कठिन रहे हों, उन्होंने हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। वह टूटते रहे, पर जूझते रहे, ताकि उनके बच्चे दुनिया की दौड़ में कभी पीछे न छूट जाएं और हमेशा आगे बढ़ सकें।
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, कॉलेज के दिनों में मैंने एक बार ज़िद पकड़ ली थी कि मुझे लैपटॉप चाहिए ही चाहिए। उस वक्त उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह इतनी बड़ी रकम अचानक निकाल सकें। लेकिन मैं अपनी बचकानी ज़िद पर अड़ गया था। मेरी उस नासमझ ज़िद के आगे वह बेबस हो गए और अपनी उस हार में भी उन्होंने मेरी खुशी ढूंढ ली। उन्होंने अपनी सालों की जमा-पूंजी, अपने भविष्य की सुरक्षा—यानी अपने पीएफ (PF) फंड से पैसे निकाले और बिना किसी मलाल के मुझे वह लैपटॉप दिला दिया।
वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूमता रहा। कुछ सालों बाद वह लैपटॉप भी पुराना होकर खराब हो गया, लेकिन मैंने उसे कभी खुद से दूर नहीं होने दिया। जब उम्र बढ़ी और जीवन में थोड़ी समझदारी आई, तब अहसास हुआ कि जिंदगी में सब कुछ हमारी ज़िद या हमारे हिसाब से नहीं चलता।
कुछ चीजें, कुछ फैसले नियति के भरोसे भी छोड़ देने चाहिए। वह खराब हो चुका लैपटॉप आज भी मेरे पास सुरक्षित रखा है। वह मेरे लिए महज़ एक मशीन नहीं, बल्कि मेरे पिता के त्याग का जीता-जागता दस्तावेज़ है। जब भी कभी मुझमें थोड़ा सा भी गुरूर या घमंड सिर उठाने लगता है, मैं चुपचाप उस लैपटॉप को देख लेता हूँ। वह मुझे मेरी औकात याद दिलाता है और यह अहसास कराता है कि मेरे पिता मेरे लिए क्या हैं।
खैर, मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे उनके साथ जिंदगी का एक लंबा वक्त गुजारने का मौका मिला। मैंने उन्हें करीब से देखा, उनसे बहुत कुछ सीखा और समझा। लेकिन यह भी एक अजीब कशमकश है कि इतनी समझ आने के बाद भी मुझमें कभी इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि मैं उनके सामने खड़ा होकर सीधे उनकी आँखों में आँखें डाल कर यह कह सकूं कि—”आप मेरे लिए क्या हैं! आप मेरे सबसे बड़े हीरो हैं, जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं आज इस बेरहम दुनिया से लड़ सकूं, एक अच्छी नौकरी कर सकूं और खुद को समाज की एक बेहतर कतार में खड़ा देख सकूं।”
यह हमारे रिश्ते की एक मूक खूबसूरती है कि न तो कभी उन्होंने मुझसे खुलकर कुछ कहा, और न ही मैंने कभी किसी और से ज़िक्र किया कि हम दोनों एक-दूसरे के बारे में कितना सोचते हैं। हम कभी अपने जज्बात जताते नहीं, कभी दिखावा नहीं करते। लेकिन जब भी कभी जिंदगी की धूप में मैं उदास होता हूँ, अकेलेपन से घिरता हूँ, तो उनकी यादें बरबस ही मेरे दिल को छूकर गुजर जाती हैं।
एक अजीब सी तड़प उठती है… मगर फिर भी, हाथ में मौजूद इस फोन का डायल पैड कभी उस नंबर तक नहीं पहुँच पाता। मैं चाहकर भी कभी फोन लगाकर उनसे यह नहीं कह पाता कि मैं उन सभी को कितना याद करता हूँ, और मेरे दिल में उनके लिए कितना बेइंतहा प्रेम और सम्मान छुपा है।
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