MUKESH. Emotions Called Bhawuk

शम्स जमील-नया जमाने के भोजपुरिया भिखारी ठाकुर

Mukesh Yadav
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शम्स जमील-नया जमाने के भोजपुरिया भिखारी ठाकुर

ई रचना के पढ़ला के बाद, हम आज पूरा दावा अउर भरे मन से कहत बानी की एकरा के रउआ सब इतिहास के पन्ना पर दर्ज करके राख लीं—आवे वाला वक्त में भोजपुरी साहित्य के इतिहास में शम्स जमील जी के नाम ओतने ही आदर, सम्मान अउर श्रद्धा के साथ लिहल जाई, जेतने आदर से भोजपुरी के महाप्राण, शेक्सपियर कहे जाए वाले ‘भिखारी ठाकुर’ जी के नाम लिहल जाला।


​आज के दौर में जब भोजपुरी के नाम पर चारों तरफ बाजारवाद, फूहड़ता अउर शोर के बोलबाला बा, तब शम्स जमील जी के कलम से निकलल ई एक-एक आखर (अक्षर) अइसन बुझाता जनु जेठ के दुपहरिया में माई के आँचरा के छाँह मिल गइल होखे।

जइसे आदरणीय भिखारी ठाकुर जी अपनी कला, नाटक अउर गीत के माध्यम से समाज के कड़वा सच, बिछोह अउर माटी के पीड़ा के अमर कर देहले, ओसही शम्स भाई आज के भागदौड़, शहरी तन्हाई अउर बिलात बचपन के दरद के एह पंक्तियन में जीवंत कर देहले बाड़े।


​एह में सिर्फ शब्द ना हँ, ई हमनी के पुरखा सभ्यता, संस्कृति अउर हर भोजपुरी भाषी के बचपन के रोअत भइल दस्तावेज बा, जवन सीधे करेजा चीर के भीतर समा जाता। ई कविता हमनी के ई अहसास करावती बा की हमनी के कतनो कमा लीं, कतनो सम्हर जाईं, बाकिर गाँव अउर बचपन के बिना ई पेट अउर मन कहियो ना भरी।


​सिवान के माटी के धन्यबाद बा जे अइसन अनमोल हीरा के जनम देलस। अइसन कालजयी, मर्मस्पर्शी अउर रूह के झकझोर देवे वाली रचना लिखे खातिर भाई शम्स जमील जी के कलम के हमार साष्टांग प्रणाम बा। रउआ जुग-जुग जिहि अउर भोजपुरी माटी के अइसे ही समृद्ध करत रहीं।

पूरा रचना एहिजे पढ़ल जाव

उ माई के आँचरा के गजबे लोटाई
बाप के कान्हा अब कहाँ भेंटाई

जवानी बुढ़वती सम्हारत सम्हारत
बचपन दू कहाँ गइल बिलाई

उ पीपर के गाछ उ चुल्हा के आँच
उ लगन पताई मे लवडन के नाच

उ तीसी सरसों के लहके जाजाद
उ चिरई के जहिया रहे मरजाद

उ भाई आ बहिनन मे बखरा के आध
उ माड़ आ भात के कहँवा सवाद

उ सिकहर के दही माई जब मही
आपन बचपन के किस्सा जब कही

उ बचपन के बेरा अब कहाँ बा भाई
जब हड़िया के खुरचन अकेले सधाई

उ रोटी पर नून आ तेल मिलाके
माई जहिया देबे खाई दबाके

चाउर मकई आ बूंट के भुजा
एकरा ला निमन अउर का दूजा

बानी पहिले से कतनो सम्हरत
बाकि साँचो ई पेट नइखे भरत

घरवा मे जहिया से आइल तवाई
देखे ना पारे एगो भाई के भाई

जवानी बुढ़वती सम्हारत सम्हारत
बचपन अब दू कहाँ गइल बिलाई

उ होली के खुशी दिवाली के खुशी
बढ़े जब उमीर हाली हाली के खुशी

उ मन के बढ़ल उ तन के बढ़ल
उ भइया के नवकी साली के खुशी

उ इयार बनावल होशियार बनावल
ओ उमीर मे पहिला प्यार बनावल

उ इयारन से बात बात मे भिरल
उ सपना मे बड़ी उंचासे से गिरल

उ आँख मे अपना कीचड़ लभेरल
दलिदर के गाँव सिवाने से खेदल

कसार पुआ आ धोधा आ लाई
जिनगी मे फेरू ना लौट के आई

जवानी अधेड़ी सम्हारत सम्हारत
बचपन अब दु कहाँ गइल बिलाई

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